March 5, 2024

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मथुरा से तय होगा बीजेपी का एजेंडा! तो फिर यह सीट जयंत चौधरी को कैसे मिलेगी, ऐसे राजनीतिक समीकरण बन रहे हैं

रालोद प्रमुख जयंत चौधरी

रालोद प्रमुख जयंत चौधरी

राजनीतिक गलियारों में कयास लगाए जा रहे हैं कि 16 फरवरी से पहले जयंत चौधरी बीजेपी खेमे में शामिल हो सकते हैं. राष्ट्रीय लोक दल से जुड़े नेताओं की मानें तो उनकी पार्टी का यह फैसला न सिर्फ राजनीतिक तौर पर फायदेमंद होगा. दरअसल, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपना अस्तित्व बचाने के लिए भी यह फैसला दूरगामी तौर पर फायदेमंद साबित होगा…

उत्तर प्रदेश में अयोध्या और बनारस की तरह मथुरा भी बीजेपी के लिए अहम है. चूंकि अयोध्या और काशी के बाद अब बीजेपी का बड़ा राजनीतिक एजेंडा मथुरा से सेट होने की बात कही जा रही है. ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या बीजेपी मथुरा जैसी महत्वपूर्ण सीट अपने किसी गठबंधन सहयोगी को दे सकती है. दरअसल, बीजेपी और राष्ट्रीय लोकदल के बीच इस समझौते को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं कि मथुरा सीट जयंत चौधरी को दी जाएगी. राजनीतिक विशेषज्ञों के मुताबिक अगले पांच साल में मथुरा बीजेपी के लिए न सिर्फ राजनीतिक तौर पर अहम है बल्कि बीजेपी सरकार यहां धार्मिक आस्था के बड़े केंद्र के तौर पर फोकस कर रही है. राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे में बीजेपी के लिए मथुरा सीट आरएलडी के लिए छोड़ना राजनीतिक तौर पर संभव नहीं लगता. हालांकि, सीटें जरूर काफी मंथन के बाद ही तय होंगी.

सियासत के जानकारों का कहना हैं कि 16 फरवरी से पहले जयंत चौधरी बीजेपी खेमे में शामिल हो सकते हैं. राष्ट्रीय लोक दल के कुछ नेताओं की मानें तो उनकी पार्टी का यह फैसला न सिर्फ राजनीतिक तौर पर फायदेमंद होगा. वास्तव में यह निर्णय पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपना अस्तित्व बचाने के लिए भी दीर्घकालिक रूप से लाभकारी होगा।

राजनीतिक जानकार भी मानते हैं कि अगर राष्ट्रीय लोकदल एनडीए में शामिल होता है तो यह एक समझदारी भरा फैसला होगा. 2009 में राष्ट्रीय लोकदल ने बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था, लेकिन सरकार नहीं बनने की स्थिति में वह यूपीए के साथ आ गया. अब राष्ट्रीय लोकदल पिछले एक दशक से केंद्र की सत्ता से बाहर है. उनका कहना है कि मौजूदा माहौल को देखते हुए अगर राष्ट्रीय लोकदल एक बार फिर से राजनीति में बीजेपी से हाथ मिलाती है तो आरएलडी इसमें अपना सियासी फायदा जरूर देख रही होगी.

हालांकि इस दौरान सबसे बड़ी चर्चा ये है कि क्या जयंत चौधरी मथुरा सीट पर दावा ठोकेंगे या नहीं. आने वाले समय में बीजेपी के लिए मथुरा भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि अयोध्या और काशी. हिंदुत्व के नजरिए से बीजेपी आने वाले सालों में मथुरा को राजनीतिक तौर पर परखने जा रही है. अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के बाद अब बीजेपी के बड़े रणनीतिकारों का पूरा फोकस मथुरा पर है. अगले कुछ सालों तक मथुरा बीजेपी की राजनीतिक धुरी का अहम केंद्र बनने जा रहा है. ऐसे में मथुरा जैसी महत्वपूर्ण सीट राष्ट्रीय लोकदल को देने से पहले बीजेपी हर कीमत पर राजनीतिक नफा-नुकसान का आकलन करेगी. उनका मानना है कि इस लोकसभा चुनाव में बीजेपी के लिए जितनी अहम सीट बनारस और अयोध्या हैं, उतनी ही अहम सीट मथुरा भी है.

पिछले दो लोकसभा चुनाव में इस सीट पर बीजेपी ने अपना कब्जा बरकरार रखा है. 1991 से 2019 तक, 2004 के एक चुनाव को छोड़कर, यह सीट बीजेपी या उसके गठबंधन ने जीती है। इसमें जयंत चौधरी ने 2009 का चुनाव राष्ट्रीय लोक दल और बीजेपी के साथ गठबंधन करके लड़ा था, जिसमें जयंत चौधरी को जीत मिली थी. शुक्ला का कहना है कि मथुरा लोकसभा सीट पर करीब 19 लाख मतदाता हैं. इनमें करीब साढ़े तीन लाख जाट, करीब तीन लाख ब्राह्मण-ठाकुर, करीब डेढ़ लाख एससी और इतनी ही संख्या में वैश्य हैं. इसके अलावा करीब सवा लाख मुस्लिम और करीब 70 हजार यादव मतदाता हैं. जबकि अन्य जातियों के करीब चार लाख मतदाता हैं.

इन जातीय समीकरणों के बावजूद बीजेपी मथुरा में 2014 और 2019 में लगातार चुनाव जीतती रही है. अब जब राजनीतिक गलियारों में काशी और अयोध्या के बाद सबसे ज्यादा चर्चा मथुरा की हो रही है तो बीजेपी ये सीट किसी सहयोगी को कैसे दे सकती है. . वह भी तब जब बीजेपी का पूरा राजनीतिक एजेंडा अब मथुरा से तय होने जा रहा है. इसलिए इसकी संभावना बहुत कम है कि मथुरा सीट राष्ट्रीय लोकदल के खाते में जाएगी.

बागपत, कैराना, सहारनपुर और बिजनौर जैसी सीटों पर सहमति बनने के बाद भी राष्ट्रीय लोकदल को कोई नुकसान होता नहीं दिख रहा है. राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगर राष्ट्रीय लोकदल एनडीए में शामिल होता है तो वह न केवल उत्तर प्रदेश में राजनीतिक साझेदार बनकर अपने गठबंधन को मजबूत कर सकता है. दरअसल, अगर केंद्र में दोबारा मोदी सरकार की वापसी होती है तो दिल्ली की राजनीति में भी राष्ट्रीय लोकदल का बड़ा दबदबा हो सकता है. राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, इन सभी राजनीतिक संभावनाओं को देखते हुए राष्ट्रीय लोकदल के एनडीए से हाथ मिलाने की चर्चा है.

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